लगातार हो रहे नक्सली हमले को क्यों नहीं दे पा रही सीआरपीएफ करारा जवाब, कारण क्या है?

रायपुर. आय दिन हो रहे नक्सली हमले से देश आहत है और साथ ही देशवासी ये सोचने पर मजबूर है कि इन हमलों का करारा जवाब कब दिया जाएगा? दिन-दहाड़े जवानों का कत्लेआम जनता को भयभीत करता है और सवालिया निशान छोड़ता है कि ‘क्या ये नक्सलवाद हम पर इस कदर हावी हो चुका है?’

इन्हीं सवालों ने सरकार को कठघरे में  ला कर खड़ा कर दिया है, लोग यह भी जानना चाहते हैं कि कहीं हमारे जवान असलहे और सुरक्षा इंतजामों के अभाव को तो शिकार नहीं  हो गए हैं?

देश का सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल, सीआरपीएफ नक्सल प्रभावित इलाकों में हो रहे हमलों का सामना क्यों नहीं कर पा रही है। क्या उसके पास सुरक्षा संसाधनों की कमी है अगर इसका जवाब ना है तो जवान इस तरह शहीद क्यों हो रहे हैं। एक खबर पत्रिका की मानें तो सीआरपीएफ के जवानों को लगभग सवा लाख बुलेटप्रूफ हेलमेट की जरूरत है। जिसकी जगह महज 1800 बुलेटप्रूफ हेलमेट के साथ जवान मोर्चा संभाले हैं।

जहां एक ओर जवानों के  पास 7.22 एमएम की गोली झेलने वाला हेलमेट अब तक मौजूद नहीं  है, वहीं दूसरी ओर नक्सली एके-47 से हमला कर रहे हैं। सुरक्षाबलों के जवानों को उपलब्ध बुलेटप्रूफ जैकेट काफी कम हैं, यदि हैं भी तो अच्छी गुणवत्ता के नहीं। जवानों के पास जरुरत के मुताबिक 38 हजार बुलेटप्रूफ जैकेट अब तक उपलब्ध होनी चाहिए थी।

भारत का नक्सली संगठव दुनिया का चौथा खतरनाक संगठन
अमेरिकी विदेश मंत्रालय के संस्थान नेशनल कन्सोर्टियम फॉर द स्टडी ऑफ टेररिजम एंड रेस्पॉन्सेस टु टेररिजम के मुताबिक भारत का नक्सली संगठन दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक संगठन है। संस्थान के आंकड़ों के अनुसार 2015 में भारत में 793 आतंकी और बड़े हिसंक हमले हुए, जिनमें 43 प्रतिशत नक्सली संगठनों ने किए। इन हमलों में 289 लोगों की जान गई। 2015 में सीपीआई (माओवादी) ने 343 हमले किए जिनमें 176 भारतीयों की जान गई।

रक्षा विशेषज्ञ अजीत कुमार सिंह का कहना है कि, “नक्सलवाद सिर्फ बस्तर की समस्या नहीं है। छत्तीसगढ़ के साथ इसके तार ओडिशा, तेलगांना, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से जुड़े हैं। लिहाजा, इन सभी राज्यों को मिल बैठकर समन्वय के साथ एक राष्ट्रीय रणनीति बनानी होगी।”

आंतरिक सुरक्षा मजबूत बनाने के लिए सेना को चाहिए 18,000 जवान
बीते दिनों इस सूचना कि पुष्टि हुई कि कि सेना ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर आंतरिक सुरक्षा में तैनात जवानों की नियुक्तियों और उनके लिए बेहतर प्रशिक्षण तथा हथियार दिलाने की मांग की है। पत्र में पूर्व सेना उपप्रमुख फिलिप कैम्पोस की अगुवाई वाली समिति की पिछले साल मई में आई रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी कहा गया है कि आंतरिक सुरक्षा देने वाले जवानों को बेहतर प्रशिक्षण और एके-47 एसॉल्ट राइफल, लाइट मशीनगन जैसे आधुनिक हथियार भी उपलब्ध कराए जाएं। नियुक्तियों में करीब डेढ़ करोड़ रु. खर्च होगा। सेना को 18,000 अतिरिक्त जवानों (370 नई पलटन) की जरूरत है। आधुनिक उपकरण, हथियारों पर सरकार को अलग से खर्च करना होगा।

पिछले साल पठानकोट एयरबेस, उरी तथा नगरोटा में सेना कैंपों पर बड़े आतंकी हमलों और इस साल सुकमा में बड़े नक्सली हमलों के बावजूद सरकार ने कैम्पोस कमेटी की अनुशंसाओं को लागू नहीं किया है। खुफिया तंत्र बेहतर करने के लिए सुरक्षाबलों को जासूसी विमान की ज़रुरत है। सुकमा हमले में जासूसी विमान कारगर साबित होता जिसकी कमी को महसूस किया गया।

सुरक्षाबलों को एमपीवी की है ज़रुरत
एमपीवी यानि माइनिंग प्रोटेक्टेड वेहिकल, आंकड़ों की माने तो सुरक्षाबलों के पास इस वक़्त मात्र 125 माइनिंग प्रोटेक्टेड वेहिकल (एमपीवी) गाड़ियां मौजूद है जबकि 700 और माइनिंग प्रोटेक्टेड वेहिकल की ज़रुरत है।

रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि, “15 किलोग्राम तीव्रता तक का विस्फोट एमपीवी वाहन झेल सकता है। बस्तर में सड़क बनवाने जैसे कामों का जिम्मा सुरक्षाबल के जवानों पर है। इसलिए उस दौरान बड़े विस्फोटों से बचने के लिए एमपीवी वाहन की सख्त जरुरत पड़ती है।”

केंद्र सरकार की परियोजनाओं से तिलमिलाया नक्सलवाद
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिंसाग्रस्त इलाकों में बड़ी परियोजनाओं को तेज करने पर ख़ासा ज़ोर दे रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यह ज़ोर माओवादियों को हैरान कर रहा है और यह भी लगातार होते इन हमलों के पीछे छुपा एक कारण हो सकता है।

जनजातियों के प्रति संवैधानिक जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए रक्षा विशेषज्ञ सी.उदय भास्कर का कहना है कि, “इस समस्या को रक्षा के अलावा अन्य पहलुओं से देखना चाहिए। माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सेना द्वारा एयर पावर का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। यह देश का आंतरिक मामला है।”

इन सभी से एक बात का खुलासा होता है कि देश पर कुर्बान होने वाले जवानों के  पास सुरक्षा संसाधनों की कमी उन्हें कमज़ोर बना रही है सरकार इस बारे में केवल सोच विचार नहीं एक प्रभावकारी निर्णय लेना चाहिए। जो देशहित के लिए और देश को गौरवान्वित करने वाले जवानों के लिए कारगर साबित हो।

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